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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रिय़ां पुरा |  ४   क
जामदग्न्यस्तपस्तेपे महेन्द्रे पर्वतोत्तमे ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति