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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्त्वा स महीं देवो व्रह्मा राजन्विसृज्य च |  ४५   क
आदिदेश तदा सर्वान्विवुधान्भूतकृत्स्वय़म् ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति