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आदि पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
तथैव च समानीय़ गन्धर्वाप्सरसां गणान् |  ४७   क
उवाच भगवान्सर्वानिदं वचनमुत्तमम् |  ४७   ख
स्वैरंशैः सम्प्रसूय़ध्वं यथेष्टं मानुषेष्विति ||  ४७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति