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शान्ति पर्व
अध्याय ५८
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भीष्म उवाच
न च शत्रुरवज्ञेय़ो दुर्वलोऽपि वलीय़सा |  १७   क
अल्पोऽपि हि दहत्यग्निर्विषमल्पं हिनस्ति च ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति