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शान्ति पर्व
अध्याय ५८
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भीष्म उवाच
राज्यं सर्वामिषं नित्यमार्जवेनेह धार्यते |  २२   क
तस्मान्मिश्रेण सततं वर्तितव्यं युधिष्ठिर ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति