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शान्ति पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दीनमना भीष्ममुवाच कुरुसत्तमः |  २७   क
नेत्राभ्यामश्रुपूर्णाभ्यां पादौ तस्य शनैः स्पृशन् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति