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द्रोण पर्व
अध्याय १०९
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सञ्जय़ उवाच
ते व्यरोचन्त नाराचाः प्रविशन्तो वसुन्धराम् |  ३०   क
गच्छत्यस्तं दिनकरे दीप्यमाना इवांशवः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति