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अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
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भीष्म उवाच
अत्र ते वर्तय़िष्यामि यथा धर्मः सनातनः |  ३२   क
राजन्यो व्राह्मणं राजन्पुरा परिचचार ह |  ३२   ख
वैश्यो राजन्यमित्येव शूद्रो वैश्यमिति श्रुतिः ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति