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अनुशासन पर्व
अध्याय ५८
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भीष्म उवाच
दूराच्छूद्रेणोपचर्यो व्राह्मणोऽग्निरिव ज्वलन् |  ३३   क
संस्पर्शपरिचर्यस्तु वैश्येन क्षत्रिय़ेण च ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति