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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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जनमेजय़ उवाच
उत्तङ्काय़ वरं दत्त्वा गोविन्दो द्विजसत्तम |  १   क
अत ऊर्ध्वं महावाहुः किं चकार महाय़शाः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति