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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
तदा च कृष्णसांनिध्यमासाद्य भरतर्षभ |  १४   क
शक्रसद्मप्रतीकाशो वभूव स हि शैलराट् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति