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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
उपय़ातं तु वार्ष्णेय़ं भोजवृष्ण्यन्धकास्तदा |  १७   क
अभ्यगच्छन्महात्मानं देवा इव शतक्रतुम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति