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द्रोण पर्व
अध्याय १६५
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सञ्जय़ उवाच
भास्करस्येव पतनं समुद्रस्येव शोषणम् |  ७३   क
विपर्यासं यथा मेरोर्वासवस्येव निर्जय़म् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति