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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
दीपवृक्षैश्च सौवर्णैरभीक्ष्णमुपशोभितः |  ७   क
गुहानिर्झरदेशेषु दिवाभूतो वभूव ह ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति