वन पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

स भवान्रथमास्थाय़ सर्वोपकरणान्वितम् |  ८०   क
त्वरमाणोऽभिनिर्यातु चिरमर्थोपपादकम् ||  ८०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति