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सभा पर्व
अध्याय ५८
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युधिष्ठिर उवाच
अय़ं धर्मान्सहदेवोऽनुशास्ति; लोके ह्यस्मिन्पण्डिताख्यां गतश्च |  १४   क
अनर्हता राजपुत्रेण तेन; त्वय़ा दीव्याम्यप्रिय़वत्प्रिय़ेण ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति