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सभा पर्व
अध्याय १८
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वासुदेव उवाच
न स शक्यो रणे जेतुं सर्वैरपि सुरासुरैः |  २   क
प्राणय़ुद्धेन जेतव्यः स इत्युपलभामहे ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति