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सभा पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
एतच्छ्रुत्वा व्यवसितो निकृतिं समुपाश्रितः |  २५   क
जितमित्येव शकुनिर्युधिष्ठिरमभाषत ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति