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सभा पर्व
अध्याय ५८
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युधिष्ठिर उवाच
अय़ुतं प्रय़ुतं चैव खर्वं पद्मं तथार्वुदम् |  ३   क
शङ्खं चैव निखर्वं च समुद्रं चात्र पण्यताम् |  ३   ख
एतन्मम धनं राजंस्तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति