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सभा पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन भारत |  ३८   क
धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां निःसृता गिरः ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति