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सभा पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
शिरो गृहीत्वा विदुरो गतसत्त्व इवाभवत् |  ४०   क
आस्ते ध्याय़न्नधोवक्त्रो निःश्वसन्पन्नगो यथा ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति