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सभा पर्व
अध्याय ५८
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वैशम्पाय़न उवाच
जहर्ष कर्णोऽतिभृशं सह दुःशासनादिभिः |  ४२   क
इतरेषां तु सभ्यानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति