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सभा पर्व
अध्याय ५८
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युधिष्ठिर उवाच
पुरं जनपदो भूमिरव्राह्मणधनैः सह |  ७   क
अव्राह्मणाश्च पुरुषा राजञ्शिष्टं धनं मम |  ७   ख
एतद्राजन्धनं मह्यं तेन दीव्याम्यहं त्वय़ा ||  ७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति