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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
उत्पतन्तः खगास्ते तु वाक्यमाहुस्तदा नलम् |  १४   क
दृष्ट्वा दिग्वाससं भूमौ स्थितं दीनमधोमुखम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति