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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
उद्वेपते मे हृदय़ं सीदन्त्यङ्गानि सर्वशः |  २४   क
तव पार्थिव सङ्कल्पं चिन्तय़न्त्याः पुनः पुनः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति