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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
श्रान्तस्य ते क्षुधार्तस्य चिन्तय़ानस्य तत्सुखम् |  २६   क
वने घोरे महाराज नाशय़िष्यामि ते क्लमम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति