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वन पर्व
अध्याय ५८
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नल उवाच
न चाहं त्यक्तुकामस्त्वां किमर्थं भीरु शङ्कसे |  २९   क
त्यजेय़महमात्मानं न त्वेव त्वामनिन्दिते ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति