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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
शिष्टा ते दमय़न्त्येका सर्वमन्यद्धृतं मय़ा |  ३   क
दमय़न्त्याः पणः साधु वर्ततां यदि मन्यसे ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति