वन पर्व  अध्याय ५८

दमय़न्त्यु उवाच

पन्थानं हि ममाभीक्ष्णमाख्यासि नरसत्तम |  ३२   क
अतोनिमित्तं शोकं मे वर्धय़स्यमरप्रभ ||  ३२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति