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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
पुष्करेणैवमुक्तस्य पुण्यश्लोकस्य मन्युना |  ४   क
व्यदीर्यतेव हृदय़ं न चैनं किञ्चिदव्रवीत् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति