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द्रोण पर्व
अध्याय ७४
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सञ्जय़ उवाच
यत्र यत्र रथो याति पाण्डवस्य महात्मनः |  ५   क
तत्र तत्रैव दीर्यन्ते सेनास्तव विशां पते ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति