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उद्योग पर्व
अध्याय ५८
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वासुदेव उवाच
अर्थांस्त्यजत पात्रेभ्यः सुतान्प्राप्नुत कामजान् |  २०   क
प्रिय़ं प्रिय़ेभ्यश्चरत राजा हि त्वरते जय़े ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति