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उद्योग पर्व
अध्याय ५८
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वासुदेव उवाच
मद्द्वितीय़ं पुनः पार्थं कः प्रार्थय़ितुमिच्छति |  २३   क
यो न कालपरीतो वाप्यपि साक्षात्पुरन्दरः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति