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विराट पर्व
अध्याय ४
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धौम्य उवाच
नाहमस्य प्रिय़ोऽस्मीति मत्वा सेवेत पण्डितः |  २०   क
अप्रमत्तश्च यत्तश्च हितं कुर्यात्प्रिय़ं च यत् ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति