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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
को नु राजकुले जातः कौरवेय़ो विशेषतः |  ३१   क
निरर्थकं महद्वैरं कुर्यादन्यः सुय़ोधनात् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति