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भीष्म पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
दुर्मर्षणश्च विंशत्या चित्रसेनश्च पञ्चभिः |  २४   क
दुर्मुखो नवभिर्वाणैर्दुःसहश्चापि सप्तभिः |  २४   ख
विविंशतिः पञ्चभिश्च त्रिभिर्दुःशासनस्तथा ||  २४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति