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शान्ति पर्व
अध्याय १३७
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पूजन्यु उवाच
नित्यं वुद्धिमतो ह्यर्थः स्वल्पकोऽपि विवर्धते |  ८४   क
दाक्ष्येण कुरुते कर्म संय़मात्प्रतितिष्ठति ||  ८४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति