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वन पर्व
अध्याय ११५
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अकृतव्रण उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय़ राजन्वरुणमव्रवीत् |  १५   क
एकतःश्यामकर्णानां पाण्डुराणां तरस्विनाम् |  १५   ख
सहस्रं वाजिनामेकं शुल्कार्थं मे प्रदीय़ताम् ||  १५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति