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भीष्म पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
पृष्ठं भीमस्य रक्षन्तः शरवर्षेण वारणान् |  ३७   क
अभ्यधावन्त वर्षन्तो मेघा इव गिरीन्यथा ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति