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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
गोविन्दवाक्यं त्वरितं विचिन्त्य; दध्रे मतिं शल्यविनाशनाय़ |  ३६   क
स धर्मराजो निहताश्वसूते; रथे तिष्ठञ्शक्तिमेवाभिकाङ्क्षन् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति