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भीष्म पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
गदय़ा वध्यमानास्ते मार्गणैश्च समन्ततः |  ६०   क
स्वान्यनीकानि मृद्नन्तः प्राद्रवन्कुञ्जरास्तव ||  ६०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति