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शान्ति पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽर्थगतितत्त्वज्ञः प्रथमं प्रतिभानवान् |  ४   क
जगाद विदुरो वाक्यं धर्मशास्त्रमनुस्मरन् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति