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द्रोण पर्व
अध्याय ६६
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सञ्जय़ उवाच
इय़ेष पाण्डवस्तस्य वाणैश्छेत्तुं शरासनम् |  १२   क
तस्य चिन्तय़तस्त्वेवं फल्गुनस्य महात्मनः |  १२   ख
द्रोणः शरैरसम्भ्रान्तो ज्यां चिच्छेदाशु वीर्यवान् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति