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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
जजाप जप्यं कौन्तेय़ः सतां मार्गमनुष्ठितः |  १२   क
ततोऽग्निशरणं दीप्तं प्रविवेश विनीतवत् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति