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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
द्वितीय़ां पुरुषव्याघ्रः कक्ष्यां निष्क्रम्य पार्थिवः |  १४   क
तत्र वेदविदो विप्रानपश्यद्व्राह्मणर्षभान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति