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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
अक्षतैः सुमनोभिश्च वाचय़ित्वा महाभुजः |  १६   क
तान्द्विजान्मधुसर्पिर्भ्यां फलैः श्रेष्ठैः सुमङ्गलैः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति