द्रोण पर्व  अध्याय ५८

सञ्जय़ उवाच

पठन्ति पाणिस्वनिका मागधा मधुपर्किकाः |  २   क
वैतालिकाश्च सूताश्च तुष्टुवुः पुरुषर्षभम् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति