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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
ततः शुद्धान्तमासाद्य जानुभ्यां भूतले स्थितः |  ३०   क
शिरसा वन्दनीय़ं तमभिवन्द्य जगत्पतिम् ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति