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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
कुण्डली वद्धनिस्त्रिंशः संनद्धकवचो युवा |  ३१   क
अभिप्रणम्य शिरसा द्वाःस्थो धर्मात्मजाय़ वै |  ३१   ख
न्यवेदय़द्धृषीकेशमुपय़ातं महात्मने ||  ३१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति