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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
सोऽव्रवीत्पुरुषव्याघ्रः स्वागतेनैव माधवम् |  ३२   क
अर्घ्यं चैवासनं चास्मै दीय़तां परमार्चितम् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति