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द्रोण पर्व
अध्याय ५८
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सञ्जय़ उवाच
प्रतिवुद्धः सुखं सुप्तो महार्हे शय़नोत्तमे |  ७   क
उत्थाय़ावश्यकार्यार्थं यय़ौ स्नानगृहं ततः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति